खेती के साथ गोबर बना कमाई का जरिया, हर महिने कमाता 50 हजार, आप भी खेती करते है तो अपनाएं ये फॉर्मूला
Cow Dung Vermi Compost: पूर्णिया जिले के हरदा पंचायत स्थित ठाडा गांव के किसान गोपाल कुमार पिछले 30 साल से खेती कर रहे हैं। पिछले 5 साल से उन्होंने रासायनिक खाद का प्रयोग पूरी तरह बंद कर दिया है और अब वर्मी कंपोस्ट (केंच…
Cow Dung Vermi Compost: पूर्णिया जिले के हरदा पंचायत के ठाडा गांव में रहने वाले किसान गोपाल कुमार पिछले 30 साल से खेती कर रहे हैं। पिछले 5 साल से उन्होंने अपने खेत में रासायनिक खाद का प्रयोग पूरी तरह बंद कर दिया है। अब वह सिर्फ वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) का इस्तेमाल कर सब्जियों की खेती करते हैं। वह खुद 25 देशी गायों का पालन करते हैं और इन गायों के गोबर से वर्मी कंपोस्ट बनाते हैं। जरूरत पड़ने पर वह गांव के दूसरे पशुपालकों से 5 रुपये प्रति किलो के हिसाब से गोबर खरीदते हैं और 3 महीने की प्रक्रिया के बाद तैयार वर्मी कंपोस्ट को 12 रुपये प्रति किलो की दर से स्थानीय किसानों को बेचते हैं।
किसान गोपाल कुमार ने क्यों छोड़ा रासायनिक खाद का इस्तेमाल
गोपाल कुमार बताते हैं कि वह मुख्य रूप से सब्जियों की खेती करते हैं। करीब 5 साल पहले उन्होंने फैसला किया कि अब केमिकल युक्त खाद का इस्तेमाल नहीं करेंगे। रासायनिक खाद से फसल तो जल्दी बढ़ती है, लेकिन लंबे समय में मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है और सब्जियों का स्वाद भी खराब हो जाता है। उन्होंने जैविक खेती की तरफ रुख किया और वर्मी कंपोस्ट को अपनाया। इससे न सिर्फ उनकी फसल की गुणवत्ता बेहतर हुई, बल्कि उत्पादन भी अच्छा होने लगा।
वर्मी कंपोस्ट बनाने की पूरी प्रक्रिया
गोपाल कुमार के मुताबिक वर्मी कंपोस्ट बनाने की प्रक्रिया काफी सरल है, लेकिन इसमें थोड़ा समय लगता है और सही तरीके से ध्यान रखना पड़ता है।
पहला चरण: गोबर का संग्रह और ठंडा करना
वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए सबसे पहले देशी गाय का ताजा गोबर लेना होता है। गोपाल कुमार के पास खुद 25 देशी गाय हैं, इसलिए उन्हें गोबर की कमी नहीं होती। जब ज्यादा जरूरत होती है तो वह गांव के दूसरे पशुपालकों से 5 रुपये प्रति किलो के हिसाब से गोबर खरीदते हैं। गोबर इकट्ठा करने के बाद उसे करीब 3 महीने तक ठंडा होने के लिए रखा जाता है। ताजा गोबर में ज्यादा गर्मी होती है, जो केंचुओं के लिए नुकसानदायक हो सकती है। इसलिए गोबर को पहले आंशिक रूप से विघटित होने देना जरूरी है।

दूसरा चरण: केंचुआ डालना
गोबर ठंडा हो जाने के बाद उसमें खास तरह के केंचुए (आमतौर पर आइसेनिया फेटिडा प्रजाति) डाले जाते हैं। ये केंचुए गोबर को खाते हैं और उसे पचाकर बेहतरीन खाद में बदल देते हैं। केंचुआ डालने के बाद नमी और तापमान का सही संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी है।

तीसरा चरण: वर्मी कंपोस्ट तैयार होना
करीब 3 महीने की इस पूरी प्रक्रिया के बाद वर्मी कंपोस्ट तैयार हो जाती है। इस खाद में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (NPK) जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं, जो फसल के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं।
वर्मी कंपोस्ट की बिक्री और मुनाफे का गणित
गोपाल कुमार तैयार वर्मी कंपोस्ट को स्थानीय किसानों को 12 रुपये प्रति किलो की दर से बेचते हैं। वह खुद भी इस खाद का इस्तेमाल अपनी सब्जियों की खेती में करते हैं। अगर बाजार के हिसाब से देखें तो वर्मी कंपोस्ट की कीमत 10 से 50 रुपये प्रति किलो तक हो सकती है। गुणवत्ता, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के आधार पर इसकी कीमत और भी बढ़ सकती है।
गोबर खरीदने की लागत: 5 रुपये प्रति किलो
बिक्री मूल्य: 12 रुपये प्रति किलो
प्रति किलो मुनाफा: 7 रुपये (अन्य छोटे खर्चों को छोड़कर)
यानी 100 किलो गोबर से बनी वर्मी कंपोस्ट बेचने पर करीब 700 रुपये का मुनाफा हो सकता है। अगर बड़े स्तर पर उत्पादन किया जाए तो इससे लाखों रुपये की सालाना आमदनी हो सकती है।

वर्मी कंपोस्ट के फायदे
मिट्टी की सेहत सुधरती है
वर्मी कंपोस्ट मिट्टी में वायु संचार बढ़ाता है, पानी सोखने की क्षमता सुधारता है और मिट्टी के कणों को आपस में जोड़ता है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है।
फसल की गुणवत्ता और पैदावार बढ़ती है
वर्मी कंपोस्ट में फसल बढ़ाने वाले सभी जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं। कई अध्ययनों में पाया गया है कि वर्मी कंपोस्ट के इस्तेमाल से फसल की पैदावार में 5 से 13 फीसदी तक का इजाफा हो सकता है। सब्जियों में इसका और भी बेहतर असर देखने को मिलता है।

केमिकल खर्च बचत होती है
रासायनिक खाद के मुकाबले वर्मी कंपोस्ट सस्ती पड़ती है और इससे मिट्टी को कोई नुकसान नहीं होता। एक अध्ययन के मुताबिक वर्मी कंपोस्ट बनाने की लागत करीब 1.5 रुपये प्रति किलो आती है, जबकि बाजार में यह कई गुना ज्यादा कीमत पर बिकती है।
पर्यावरण को फायदा
रासायनिक खाद के कम इस्तेमाल से मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषण से बचते हैं। वर्मी कंपोस्ट पूरी तरह जैविक और पर्यावरण के अनुकूल है।
वर्मी कंपोस्ट की बाजार में मांग
जैविक खेती की तरफ बढ़ते रुझान के कारण वर्मी कंपोस्ट की मांग लगातार बढ़ रही है। बाजार में यह 30 से 50 रुपये प्रति किलो तक बिक जाती है। अच्छी पैकेजिंग और ब्रांडिंग से इसकी कीमत और बढ़ सकती है। ओडिशा में महिला स्वयं सहायता समूहों ने वर्मी कंपोस्ट बनाकर सालाना 300-320 टन उत्पादन किया और हर महीने 3,000 से 6,000 रुपये की अतिरिक्त आमदनी हासिल की।
सरकारी योजनाओं का लाभ
केंद्र सरकार और राज्य सरकारें जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगाने पर सब्सिडी दे रही हैं। गोवर्धन जैविक उर्वरक योजना के तहत किसानों को वर्मी कंपोस्ट यूनिट बनाने पर 10,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। इस योजना का लाभ उन किसानों को मिलता है जिनके पास कम से कम तीन गोवंश हैं। आवेदन ऑनलाइन या कृषि विभाग के माध्यम से किया जा सकता है।
क्या आप भी शुरू कर सकते हैं वर्मी कंपोस्ट बिजनेस?
अगर आपके पास गाय या भैंस हैं तो आप उनके गोबर से वर्मी कंपोस्ट बनाकर अच्छी कमाई कर सकते हैं। शुरुआत में 15,000 से 50,000 रुपये की लागत आ सकती है। इसके लिए जरूरी है:
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छायादार जगह या शेड
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गोबर या अन्य जैविक कचरा
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केंचुआ (आइसेनिया फेटिडा)
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पानी की उचित व्यवस्था
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नमी और तापमान का सही रखरखाव
वर्मी कंपोस्ट बनाने का काम घर, खेत या डेयरी फार्म पर आसानी से किया जा सकता है। यह कम लागत का धंधा है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
पूर्णिया के इस किसान से कैसे करें संपर्क
अगर आप पूर्णिया में रहते हैं और वर्मी कंपोस्ट खरीदना चाहते हैं या अपना गोबर बेचना चाहते हैं, तो आप किसान गोपाल कुमार से 8877757130 नंबर पर संपर्क कर सकते हैं। वह स्थानीय किसानों को वर्मी कंपोस्ट उपलब्ध कराते हैं और गोबर खरीदते भी हैं।




