मंगलवार, 25 अगस्त 2026 | 18:14 ISTFollow us at:
खेती-बाड़ी

सिंचाई के बाद ग्वार-नरमा के पौधे पड़ रहे पीले तो न करें अनदेखी, जड़ों में हो सकती है ये बीमारी

सिंचाई के बाद ग्वार या नरमा के पौधे पीले होकर सूख रहे हैं तो जड़-गलन की जांच करें। जानें रोग के लक्षण, दूसरी बीमारियों से फर्क और बचाव के सही उपाय।

सिंचाई के बाद ग्वार और नरमा में जड़ गलन से पीले पड़ते पौधे
सिंचाई के बाद ग्वार और नरमा में जड़ गलन से पीले पड़ते पौधे

हरियाणा में ग्वार और नरमा की फसल लेने वाले किसानों को सिंचाई या बारिश के बाद अचानक पीले पड़ते और मुरझाते पौधों पर नजर रखने की जरूरत है। खेत में पर्याप्त नमी होने के बावजूद यदि कुछ पौधे पीले होकर सूखने लगें और उनकी जड़ें भूरी-काली होकर गलती दिखाई दें, तो यह जड़-गलन रोग का संकेत हो सकता है।

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) के अनुसार कपास में जड़-गलन मिट्टी से फैलने वाले प्रमुख रोगों में शामिल है और जुलाई-अगस्त के दौरान इसका प्रकोप ज्यादा दिखाई दे सकता है। ग्वार में भी कृषि विशेषज्ञ जलभराव से बचाव, रोगग्रस्त पौधों को अलग करने और उपचारित बीज के इस्तेमाल पर जोर देते हैं।

कैसे पहचानें कि पौधे में जड़-गलन है?

सिर्फ पत्तियां पीली होने से जड़-गलन की पुष्टि नहीं होती। किसान पौधे की जड़ों को देखकर शुरुआती पहचान कर सकते हैं।

जड़-गलन से प्रभावित नरमा का पौधा ऊपर से मुरझाना शुरू कर सकता है। बाद में पूरा पौधा सूखने लगता है और उसे खींचने पर स्वस्थ पौधे के मुकाबले आसानी से बाहर निकल आता है। जड़ें गली हुई, रेशेदार और भूरे या काले रंग की दिख सकती हैं तथा कई मामलों में जड़ की छाल भी उतरने लगती है।

ग्वार में भी जड़-गलन होने पर जड़ों पर भूरे धब्बे बनने, जड़ सड़ने, पौधे के मुरझाने और बढ़वार रुकने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। हाल में सिरसा क्षेत्र में कृषि अधिकारियों ने किसानों को ग्वार में जड़-गलन सहित अन्य रोगों की निगरानी करने और खेत में पानी जमा नहीं होने देने की सलाह दी थी।

सिंचाई के बाद ही पौधे ज्यादा क्यों दिखाई देते हैं पीले?

जड़-गलन पैदा करने वाले कई फफूंद मिट्टी में मौजूद रहते हैं। खेत में अधिक नमी और पानी रुकने की स्थिति रोग के फैलाव को बढ़ा सकती है। इसी वजह से कई बार सिंचाई या अच्छी बारिश के कुछ समय बाद रोगग्रस्त हिस्से ज्यादा साफ दिखाई देने लगते हैं।

खासकर जिन खेतों में पहले भी जड़-गलन की समस्या रही हो, उनमें ज्यादा पानी देना या जल निकासी खराब रहना जोखिम बढ़ा सकता है। कृषि विभाग की हाल की खेत सलाह में भी ग्वार के लिए जलभराव से बचने और संतुलित सिंचाई पर जोर दिया गया है।

इसलिए सिंचाई करते समय खेत में लंबे समय तक पानी खड़ा न रहने दें और ऐसे हिस्सों की अलग से पहचान करें जहां बार-बार पौधे सूख रहे हों।

हर पीला पौधा जड़-गलन नहीं, पहले जड़ जरूर देखें

किसानों के लिए यह फर्क समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि ग्वार और नरमा में पीलापन कई दूसरी वजहों से भी आ सकता है।

ग्वार की पत्तियां पीली पड़ने के साथ उनकी किनारी काली होने लगे या पत्तियों पर धब्बे दिखाई दें तो यह जीवाणु अंगमारी या पत्ती से जुड़ा दूसरा रोग भी हो सकता है। अगस्त में महेंद्रगढ़ क्षेत्र में भी किसानों को पीली पत्तियों और काली किनारी को ग्वार में अंगमारी के संभावित लक्षण के रूप में देखने की सलाह दी गई थी।

नरमा में सिंचाई के बाद अचानक पौधा मुरझाने की एक वजह पैराविल्ट भी हो सकती है। HAU के सिरसा कपास अनुसंधान केंद्र ने इसे कपास की उभरती समस्या बताया है और इसके लिए अलग प्रबंधन सिफारिश दी है। इसलिए बिना जड़ देखे हर मुरझाते पौधे को जड़-गलन मानकर दवा डालना सही नहीं होगा।

किसान इस तरह शुरुआती फर्क देख सकते हैं

दिखाई देने वाला लक्षण संभावित समस्या
पौधा पीला-मुरझाया, जड़ गली और छाल उतरती हुई जड़-गलन की आशंका
ग्वार की पत्तियां पीली और किनारे काले/धब्बेदार अंगमारी की आशंका
नरमा अचानक मुरझाए लेकिन जड़ सड़ी न मिले पैराविल्ट सहित दूसरी वजह की जांच जरूरी
पूरे खेत में समान पीलापन पोषण या अन्य कारण भी हो सकते हैं

नरमा में जड़-गलन दिखे तो किसान क्या करें?

HAU की कपास संबंधी प्रकाशित सलाह के अनुसार गंभीर रूप से जड़-गलन से ग्रस्त पौधे को वापस स्वस्थ करना मुश्किल होता है। इसलिए रोग को आसपास के स्वस्थ पौधों तक फैलने से रोकना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

शुरुआती लक्षणों वाले हिस्से में HAU/ICAR की सलाह में कार्बेन्डाजिम 50 WP की 20 ग्राम मात्रा 10 लीटर पानी में घोलकर जड़ क्षेत्र में देने की सिफारिश की गई है। खेत में बीमारी की सही पहचान होने के बाद ही यह उपचार करना चाहिए।

इसके साथ किसान:

  • खेत में अतिरिक्त पानी तुरंत निकालें।
  • रोग वाले हिस्से की पहचान कर बाकी खेत की निगरानी करें।
  • ज्यादा संक्रमित और पूरी तरह सूख चुके पौधों को खेत में पड़े न रहने दें।
  • बिना रोग की पहचान किए अलग-अलग फफूंदनाशक या कीटनाशक न मिलाएं।

सिरसा में कृषि विभाग की टीम ने भी किसानों को बिना पहचान के दवा का छिड़काव न करने और रोग के अनुसार कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेने को कहा है।

ग्वार में जड़-गलन से बचाव के लिए बीज उपचार सबसे जरूरी

ग्वार में जड़-गलन की रोकथाम बुवाई से ही शुरू हो जाती है। ICAR की खरीफ कृषि सलाह में ग्वार के बीज को बुवाई से पहले कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज या अनुशंसित जैव उपचार से उपचारित करने की सलाह दी गई है।

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. आरके सैनी भी ग्वार में जड़-गलन से बचाव के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार को महत्वपूर्ण बताते रहे हैं।

अगर मौजूदा खड़ी फसल में बीमारी आ चुकी है तो केवल अगली बार के बीज उपचार से वर्तमान पौधे ठीक नहीं होंगे। अभी मुख्य काम रोग की सही पहचान, जल निकासी और आसपास के स्वस्थ पौधों को बचाना है।

अगले साल उसी खेत में क्या सावधानी रखें?

जिन खेतों में बार-बार जड़-गलन आती है, वहां लगातार एक ही संवेदनशील फसल लेने से समस्या बनी रह सकती है।

कपास के लिए HAU ने रोग प्रभावित खेत में फसल चक्र अपनाने की सलाह दी है। विश्वविद्यालय की प्रकाशित सिफारिश में गंभीर जड़-गलन वाले खेत में कम से कम तीन वर्ष तक लगातार कपास न बोने और बाजरा-ज्वार जैसी दूसरी फसल लेने का विकल्प बताया गया है।

ग्वार में भी रोग प्रबंधन के लिए उपचारित बीज, खेत में अच्छा जल निकास और फसल चक्र उपयोगी बताए गए हैं।

इस समय जिन किसानों के ग्वार या नरमा में सिंचाई के बाद पौधे पीले पड़ रहे हैं, उन्हें पहले कुछ प्रभावित पौधे उखाड़कर जड़ों की स्थिति देखनी चाहिए। जड़ सड़ने के लक्षण मिलने पर समय रहते कृषि विशेषज्ञ या नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से रोग की पुष्टि कराना आगे के नुकसान को कम करने में मदद कर सकता है।

लेखक

Sandeep Kumar

संदीप कुमार LocalHaryana.com के संस्थापक और संपादक हैं। वे वर्ष 2020 से डिजिटल पत्रकारिता और ऑनलाइन समाचार प्रकाशन के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। वे मुख्य रूप से हरियाणा समाचार, सरकारी योजनाएं, नौकरियां, शिक्षा, खेतीबाड़ी और मौसम से जुड़े विषयों पर लेखन और संपादन करते हैं। उनका प्रयास पाठकों तक तथ्य आधारित, स्पष्ट और उपयोगी जानकारी सरल हिंदी में पहुँचाना है। LocalHaryana.com पर प्रकाशित सामग्री उपलब्ध आधिकारिक सूचनाओं और विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर तैयार की जाती है।

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