हरियाणा में 1000 करोड़ की लागत से पुराने वाटर वर्क्स बनेगें RCC आधारित, जर्जर पाइपलाइन भी होगी नई
हरियाणा में ₹1000 करोड़ से 466 पुराने वाटर वर्क्स RCC के बनाए जाएंगे। 1525 KM पाइपलाइन भी बदलेगी। जानें पानी में TDS, फ्लोराइड और हार्डनेस की सही सीमा।
हरियाणा में पुराने वाटर वर्क्स और जर्जर पेयजल पाइपलाइनों को बदलने की तैयारी तेज हो गई है। प्रदेश में ईंटों से बने 466 पुराने वाटर वर्क्स को आरसीसी यानी सीमेंट-कंक्रीट आधारित बनाया जा रहा है। इस काम पर लगभग 1000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अधिकारियों को उन पुराने वाटर वर्क्स को प्राथमिकता से आरसीसी आधारित बनाने के निर्देश दिए हैं, जहां भूमिगत जल मिलने से सप्लाई किए जाने वाले पानी की शुद्धता प्रभावित हो रही है। ऐसे जलघरों के पानी में TDS, हार्डनेस और फ्लोराइड की मात्रा बढ़ने की समस्या सामने आ रही है।
वाटर वर्क्स के साथ प्रदेश में 1525 किलोमीटर पुरानी वितरण पाइपलाइन भी बदली जाएगी। इनमें से 837 किलोमीटर लंबी पेयजल लाइन को मार्च 2027 तक बदलने का लक्ष्य रखा गया है।
₹1000 करोड़ से RCC में बदले जा रहे 466 पुराने वाटर वर्क्स
हरियाणा में ईंटों से निर्मित 466 वाटर वर्क्स को आरसीसी आधारित संरचनाओं में बदला जा रहा है। इस पूरे काम पर करीब 1000 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
पुराने जलघरों में भूमिगत पानी मिलने के कारण संग्रहित पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इससे पानी में TDS, हार्डनेस और फ्लोराइड की मात्रा बढ़ रही है। ऐसे पानी को पूरी तरह पीने योग्य बनाने के लिए वाटर वर्क्स में लगी मशीनों पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
आरसीसी आधारित संरचना बनाने का उद्देश्य भूमिगत पानी के अनचाहे मिश्रण को रोकना और जलघर में संग्रहित पानी की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखना है।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को केवल तय संख्या तक सीमित रहने के बजाय ऐसे सभी पुराने वाटर वर्क्स की पहचान करने के निर्देश दिए हैं, जहां भूमिगत पानी मिलने से पेयजल की शुद्धता प्रभावित हो रही है।
ट्यूबवेल की जगह नहरी पानी आधारित वाटर वर्क्स को प्राथमिकता
प्रदेश में जहां संभव होगा, वहां ट्यूबवेल से चल रहे वाटर वर्क्स को नहरी पानी आधारित बनाया जाएगा। सरकार ने अधिकारियों को इस बदलाव को प्राथमिकता के आधार पर करने के निर्देश दिए हैं।
हरियाणा में वर्तमान में जलापूर्ति के लिए:
- 1888 नहरी पानी आधारित वाटर वर्क्स
- 4199 बूस्टिंग स्टेशन
- 12,404 ट्यूबवेल
- पांच रेनी वैल योजनाएं
संचालित की जा रही हैं।
विभाग द्वारा 3674 ट्यूबवेल संबंधित ग्राम पंचायतों को सौंपे जा चुके हैं। जिन क्षेत्रों में नहरी पानी पहुंचाना व्यावहारिक होगा, वहां ट्यूबवेल आधारित आपूर्ति पर निर्भरता कम करने की योजना है।
1525 किलोमीटर पुरानी पेयजल पाइपलाइन भी होगी नई
वाटर वर्क्स के साथ जर्जर वितरण नेटवर्क को भी बदला जाएगा। प्रदेश में कुल 7005 किलोमीटर लंबे वितरण नेटवर्क में से 1525 किलोमीटर पाइपलाइन बदलने के लिए चिह्नित की गई है।
इसमें से 837 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन को मार्च 2027 तक बदलने का लक्ष्य है। शेष 688 किलोमीटर लाइन को बदलने की अंतिम समयसीमा उपलब्ध जानकारी में नहीं बताई गई है।
पुरानी और क्षतिग्रस्त पाइपलाइन बदलने से पेयजल वितरण व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलेगी। इसके साथ नए वाटर वर्क्स की क्षमता भी संबंधित क्षेत्र की बढ़ती आबादी के अनुसार तय करने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रदेश में नए वाटर वर्क्स और ट्यूबवेल लगाने का काम भी जारी
हरियाणा में मौजूदा जलापूर्ति ढांचे को सुधारने के साथ नई सुविधाएं विकसित करने की प्रक्रिया भी चल रही है।
| जलापूर्ति से जुड़ा काम | संख्या/लंबाई |
|---|---|
| RCC में बदले जा रहे पुराने वाटर वर्क्स | 466 |
| अनुमानित लागत | लगभग ₹1000 करोड़ |
| बदली जाने वाली पाइपलाइन | 1525 किलोमीटर |
| मार्च 2027 तक बदली जाने वाली पाइपलाइन | 837 किलोमीटर |
| नए नहरी पानी आधारित वाटर वर्क्स | 103 |
| नए ट्यूबवेल | 1065 |
| नए बूस्टिंग स्टेशन | 369 |
| नई रेनी वैल | 2 |
इन कामों के पूरा होने के बाद प्रदेश की जलापूर्ति क्षमता बढ़ने और पुराने वितरण नेटवर्क पर दबाव कम होने की उम्मीद है।
अच्छे पानी का TDS कितना होना चाहिए?
TDS का अर्थ पानी में घुले हुए कुल ठोस पदार्थों की मात्रा है। इसे मिलीग्राम प्रति लीटर यानी mg/L में मापा जाता है।
जल जीवन मिशन के जल गुणवत्ता निगरानी प्रोटोकॉल में दिए गए भारतीय मानक IS 10500 के अनुसार पेयजल में TDS की स्वीकार्य सीमा 500 mg/L है। वैकल्पिक जल स्रोत उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में इसकी अधिकतम अनुमेय सीमा 2000 mg/L दी गई है।
| पानी में TDS | भारतीय मानक |
| 500 mg/L तक | स्वीकार्य सीमा |
| 500 से 2000 mg/L | वैकल्पिक स्रोत न होने पर अनुमेय सीमा |
| 2000 mg/L से अधिक | अनुमेय सीमा से अधिक |
केवल TDS देखकर पानी को पूरी तरह सुरक्षित घोषित नहीं किया जा सकता। पानी में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट, बैक्टीरिया और दूसरे प्रदूषकों की जांच भी जरूरी होती है।
क्या 200 TDS का पानी पीने योग्य है?
भारतीय पेयजल मानक के अनुसार 200 mg/L TDS स्वीकार्य सीमा के भीतर है, क्योंकि निर्धारित स्वीकार्य सीमा 500 mg/L तक है।
लेकिन TDS मीटर पानी में घुले पदार्थों की कुल मात्रा बताता है। वह यह नहीं बताता कि पानी में कौन-से पदार्थ मौजूद हैं। इसलिए केवल 200 TDS होने के आधार पर पानी को पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
पानी की वास्तविक गुणवत्ता जानने के लिए रासायनिक और जीवाणु संबंधी जांच भी आवश्यक है। यह खास तौर पर उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है, जहां भूमिगत पानी में फ्लोराइड या दूसरे हानिकारक तत्व मिलने की समस्या हो सकती है।
पानी में TDS की न्यूनतम और अधिकतम मात्रा कितनी होनी चाहिए?
भारतीय मानक में TDS की कोई अलग न्यूनतम अनिवार्य सीमा नहीं दी गई है। इसमें 500 mg/L को स्वीकार्य और वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध न होने पर 2000 mg/L को अधिकतम अनुमेय सीमा बताया गया है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि 2000 mg/L TDS वाला पानी सामान्य परिस्थितियों में बेहतर माना जाएगा। यह छूट केवल उस स्थिति के लिए है, जब कोई वैकल्पिक जल स्रोत उपलब्ध न हो।
हरियाणा के पुराने वाटर वर्क्स में भूमिगत पानी मिलने से TDS बढ़ने की समस्या को रोकने का प्रयास इसी कारण किया जा रहा है।
पीने के पानी में फ्लोराइड कितना होना चाहिए?
भारतीय पेयजल मानक के अनुसार पानी में फ्लोराइड की स्वीकार्य मात्रा 1.0 mg/L है। वैकल्पिक स्रोत न होने पर इसकी अधिकतम अनुमेय सीमा 1.5 mg/L है।
| फ्लोराइड की मात्रा | मानक |
| 1.0 mg/L तक | स्वीकार्य सीमा |
| 1.0 से 1.5 mg/L | वैकल्पिक स्रोत न होने पर अनुमेय |
| 1.5 mg/L से अधिक | अनुमेय सीमा से अधिक |
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी पेयजल में फ्लोराइड के लिए 1.5 mg/L का guideline value बताता है। इससे अधिक मात्रा के लंबे समय तक संपर्क से दांतों पर असर पड़ने का जोखिम बढ़ सकता है और बहुत अधिक मात्रा हड्डियों को भी प्रभावित कर सकती है।
इसीलिए पुराने वाटर वर्क्स में भूमिगत पानी का मिश्रण रोकना जरूरी है, क्योंकि इससे फ्लोराइड की मात्रा बढ़ सकती है।
पानी की हार्डनेस कितनी होनी चाहिए?
पानी की हार्डनेस मुख्यतः कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिजों से जुड़ी होती है। भारतीय पेयजल मानक के अनुसार कुल हार्डनेस की स्वीकार्य सीमा 200 mg/L है। वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध नहीं होने पर इसकी अनुमेय सीमा 600 mg/L है।
| कुल हार्डनेस | मानक |
| 200 mg/L तक | स्वीकार्य सीमा |
| 200 से 600 mg/L | वैकल्पिक स्रोत न होने पर अनुमेय |
| 600 mg/L से अधिक | अनुमेय सीमा से अधिक |
ज्यादा हार्ड पानी से पाइप, नल और पानी गर्म करने वाले उपकरणों में परत जम सकती है। पुराने वाटर वर्क्स में भूमिगत पानी मिलने से हार्डनेस बढ़ने पर पानी को उपचारित करने वाली मशीनों पर भी दबाव बढ़ता है।
RCC वाटर वर्क्स बनने से क्या बदलाव आएगा?
पुराने ईंटों वाले जलघरों को आरसीसी आधारित बनाने का मुख्य उद्देश्य भूमिगत पानी को संग्रहित नहरी या उपचारित पानी में मिलने से रोकना है।
इससे:
- पानी में TDS, हार्डनेस और फ्लोराइड बढ़ने की समस्या नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
- जल शोधन मशीनों पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव कम हो सकता है।
- जलघर की संरचना मजबूत होगी।
- संग्रहित पानी की गुणवत्ता बनाए रखना आसान होगा।
- पुराने जलघरों से होने वाले संभावित रिसाव को रोकने में मदद मिलेगी।
हालांकि पानी की अंतिम गुणवत्ता स्रोत, शोधन प्रक्रिया और वितरण पाइपलाइन की स्थिति पर भी निर्भर करेगी। इसी कारण सरकार वाटर वर्क्स के साथ 1525 किलोमीटर पुरानी पाइपलाइन भी बदल रही है।
बढ़ती आबादी के अनुसार रखी जाएगी नए जलघरों की क्षमता
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि नए वाटर वर्क्स की क्षमता केवल वर्तमान जरूरत के आधार पर तय न की जाए। संबंधित शहर या गांव की बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए उनकी क्षमता निर्धारित की जाए।
सरकार का कहना है कि प्रदेशवासियों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना प्राथमिकता है और इसके लिए धन की कमी को बाधा नहीं बनने दिया जाएगा।
466 पुराने वाटर वर्क्स को आरसीसी आधारित बनाने, 1525 किलोमीटर पाइपलाइन बदलने और नए नहरी जलघरों एवं बूस्टिंग स्टेशनों के निर्माण से प्रदेश के पेयजल ढांचे में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। लोगों को वास्तविक लाभ काम पूरा होने और उनके क्षेत्र की जलापूर्ति व्यवस्था से जुड़ने के बाद मिलेगा।







