चंडीगढ़, 28 अक्टूबर 2026: हरियाणा में दोहलीदार, बुटीमार, भोंडेदार और मुकररीदार परिवारों के लिए बड़ी राहत की खबर है। अब इन वर्गों को दान में मिली जमीन पर मालिकाना हक दिलाने का अधिकार उपायुक्त (डीसी) से हटाकर उपमंडल अधिकारी नागरिक (एसडीएम) को दे दिया गया है।
राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग की वित्तायुक्त सुमिता मिश्रा ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिए हैं। इसका सीधा फायदा यह होगा कि पात्र परिवारों को अब मालिकाना हक के लिए जिला मुख्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे और लंबित मामले तेजी से निपट सकेंगे।
अभी तक यह अधिकार पूरी तरह से कलेक्टर यानी डीसी के पास था, जिससे उन पर काम का अतिरिक्त बोझ रहता था। इसी वजह से दोहलीदारों को मालिकाना हक के लिए काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। सरकार ने यह कदम लंबित मामलों को तेजी से निपटाने के मकसद से उठाया है। सभी एसडीएम को राज्य सरकार द्वारा राजस्व कानूनों के तहत प्रथम श्रेणी के सहायक कलेक्टर के रूप में अधिसूचित किया गया है, जिससे वे अब इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे।
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20 साल से काबिज परिवारों को मिलेगा हक
नियम के मुताबिक, जो परिवार 20 साल से इस जमीन पर काबिज हैं, वे अब सीधे एसडीएम के समक्ष मालिकाना हक के लिए आवेदन कर सकते हैं। मालिकाना हक मिलने के बाद ये परिवार जमीन को आगे किसी भी व्यक्ति या संस्था को बेच सकेंगे। इससे पहले मनोहर सरकार के पहले कार्यकाल में नियम बनाया गया था कि दोहलीदार इस जमीन की खरीद-फरोख्त नहीं कर सकते, बल्कि सिर्फ काश्तकारी कर सकते हैं।
11 दिसंबर 2022 को करनाल में हुए भगवान परशुराम महाकुंभ में तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने दोहलीदारों को करीब 1700 एकड़ जमीन का मालिकाना हक दिलाने की घोषणा की थी। अब मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की सरकार ने उस घोषणा को धरातल पर उतारने का काम किया है।
कौन होते हैं दोहलीदार
पुराने समय में गरीब ब्राह्मणों, पुजारियों और पुरोहितों को फसल बोने के लिए जमीन दान में दी जाती थी। यह जमीन पंचायती होती थी, जिस पर उनका मालिकाना हक नहीं होता था, लेकिन वे उस पर फसल बोकर होने वाली आमदनी का इस्तेमाल अपने खर्च पर कर सकते थे। हरियाणा दोहलीदार, बुटीमार, भोंडेदार तथा मुकररीदार (मालिकाना अधिकार निहित करना) अधिनियम, 2010 के तहत इन वर्गों को मालिकाना अधिकार देने का प्रावधान किया गया था ।
हालांकि, 2022 में एक संशोधन के जरिए पंचायत और सरकारी जमीनों को इस दायरे से बाहर कर दिया गया था, जिसे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मार्च 2025 में रद्द कर दिया था । हाईकोर्ट ने कहा था कि यह संशोधन दोहलीदारों के अधिकारों को अनुचित तरीके से छीनता है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है।







